मालूम नहीं कि कहाँ जाऊँगा!
तुमसे मिलकर कुछ बता जाऊँगा थोड़ी देर रुका हूँ ,चला जाऊँगा मुझे रोशनी में तलाशा न करना मैं दीये खुद ही सारे बुझा जाऊँगा
तुमसे मिलकर कुछ बता जाऊँगा थोड़ी देर रुका हूँ ,चला जाऊँगा मुझे रोशनी में तलाशा न करना मैं दीये खुद ही सारे बुझा जाऊँगा
हम वफा अपनी भला किसको सुनाने जाएँगे बहुत करेंगे तो फिर से तुम्हें आजमाने जाएँगे तुमसे कोई उलझन हो, ऐसी कोई बात नहीं है
उनसे और नहीं कुछ चाहना है यही अंतिम याचना है! साँझ में दिशाओं के धुंधले छोर पर रवि ने कुछ लिखा गगन के कोर पर
एक दर्द आराम देता रहा एक घाव मधु बरसाता रहा वह मिला था पल भर को कभी मैं उम्र भर मुस्कुराता रहा!
मैं प्रेम तो कर लूँ तुमसे किंतु तुम्हें यह प्रेम न बंधन हो जाए! यह चंद्रमा हारा लगता है अंबर भी कारा लगता है
तुम्हारा होकर भी तुमको बताना नहीं है पास आना नहीं है, दूर जाना नहीं है तुम मेरी कोई ऐसी एक उलझन-सी हो जिसमें उलझ कर मुझे सुलझाना नहीं है
अधरों में जो छिपा वो गीत तो पहचानते होगे नयनों में जो घुली वो प्रीत तो तुम जानते होगे इतना सोचा है,कितना सोचेंगे हम तुम मिलोगे तो तुमसे पूछेंगे हम!
रुपहले बादल की कल्पना करता हूँ सुनहरी किरणों की भावना करता हूँ भीगती कलियों को सोचा करता हूँ चमकती सीप की कामना करता हूँ
अपने सघन घन केशपाश में मुझे बाँध रखो कुछ देर और मौन प्रणय में साँसें अपनी तुम साध रखो कुछ देर और!