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मुझे बाँध रखो कुछ देर और!

25 Jan 2026 | 32 views

अपने सघन घन केशपाश में
मुझे बाँध रखो कुछ देर और
मौन प्रणय में साँसें अपनी
तुम साध रखो कुछ देर और!
संध्या के तन से आँचल गुलाबी
हट जाए न जब तक,मिलन नहीं है
नैनों से काजल की रेख जरा-सी
मिट जाए न जब तक,मिलन नहीं है
मिलन का ये उन्मुक्त निमंत्रण
बस याद रखो कुछ देर और
अपने सघन घन केशपाश में
मुझे बाँध रखो कुछ देर और!
लोग विलास का देंगे नाम इसे
हम किंतु पावन अभिसार कहेंगे
लोग भोग का दोष लगाएँ हजार
हम इसको निर्दोष प्यार कहेंगे
वाद-विवाद बाद में करना
उन्माद रखो कुछ देर और
अपने सघन घन केशपाश में
मुझे बाँध रखो कुछ देर और!
अधर परस जब कर ले तन को तब
जो आए समझ में वही भाषा है
अधख़ुले यौवन की मादकता में
घुल जाना जीवन की परिभाषा है
अपने अधर में मेरे अधर का
मधु स्वाद रखो कुछ देर और
अपने सघन घन केशपाश में
मुझे बाँध रखो कुछ देर और!

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