Life

क्या बुरा था इसी द्वार

25 Jan 2026 | 16 views

क्या बुरा था इसी द्वार सुबह से शाम हो जाती!
उन गलियों से लौटे हैं कई बार हम
खटखटाए हैं चुपचाप कई द्वार हम
मन से मिथ्या करते रहे मनुहार हम
एक पन्ने में कहानी तमाम हो जाती
क्या बुरा था इसी द्वार सुबह से शाम हो जाती!
ये अनंत है, इसे कैसे माप लोगे
असीम सीमा का कैसे परिमाप लोगे
चाहो तो मन से दूरी सब भाँप लोगे
मौन में ही ध्वनियाँ सब विराम हो जाती
क्या बुरा था इसी द्वार सुबह से शाम हो जाती!
जा तो रहे हो परंतु पहुँचोगे कहाँ
इस मेले के जैसा ही है मेला वहाँ
तुम्हारा तुम जैसा वहाँ,वैसा यहाँ
सब गतियाँ इसी चौखट विश्राम हो जाती
क्या बुरा था इसी द्वार सुबह से शाम हो जाती!
जितना पाना है,उतना खोना भी होगा
कुछ हँसे हो तो जरा रोना भी होगा
जो छूटा,उसका कभी होना भी होगा
मेरी भावना काश तेरे नाम हो जाती
क्या बुरा था इसी द्वार सुबह से शाम हो जाती!

Comments

Leave a Comment

No comments yet. Be the first to share your thoughts!